मेरा गुल्लक…

बचपन में  तौफों का बडा उल्हास छोटासा तोहफ़ा भी लगता खास; आज वही बचपन खुद्द एक तोहफ़ा और आस ! ऎसा एक तोहफ़ा मैंने एकबार पाया लाल मिट्टी का गोलमटोलसा वह मुझे खूब भाया; कहते थे गुल्लक उसे, जिसमे मैने मिला हर एक सिक्का छुपाया | त्योहार हो ,जन्मदिन हो या फिर किसी रिश्तेदार की… Continue reading मेरा गुल्लक…

ख्वाहिशें…

हज़ारो ख्वाहिशें सीने में दबी हैं ऐसी,नन्हीं तितलियां कही कैद हो जैसीकुछ ख्वाहिशें मर जाती हैं आज़ाद होने से पहले,जैसे तितलियों के पर किसीने काट दिए हो उडने से पहले…कुछ ख्वाहिशें चल पडती हैं पूर्णत्व के राह में,स्वछंद जग में अपना अस्तित्व बनाने के चाह मेंकुछ ख्वाहिशें बीच राहमें तोड देती हैं दम,तो कुछ आगे… Continue reading ख्वाहिशें…